Chhattisgarh High Court News: पत्नी को जबरन साथ रहने के लिए नहीं कर सकते मजबूर, हाईकोर्ट ने पति की याचिका ठुकराई, जानिए क्या कहा कोर्ट ने

Chhattisgarh High Court News: पत्नी को जबरन साथ रहने के लिए नहीं कर सकते मजबूर, हाईकोर्ट ने पति की याचिका ठुकराई, जानिए क्या कहा कोर्ट ने

बिलासपुर। क्या किसी पत्नी को जबरन पति के साथ रहने के लिए मजबूर किया जा सकता है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि ऐसा बिल्कुल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी के पास अलग रहने के लिए ठोस और पर्याप्त वजह है, तो पति का केवल यह दावा करना नाकाफी है कि उसने पत्नी को लाने के कई प्रयास किए थे। आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला और अदालत ने अपने फैसले में क्या-क्या बड़ी बातें कहीं।

जानिए क्या है पूरा मामला

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में रहने वाले प्रवीण कुमार यादव की शादी फरवरी 2022 में प्रियंका से हुई थी। शादी के कुछ महीनों बाद ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया। अक्टूबर 2022 में जब पत्नी अपनी बीमार मां को देखने मायके गई, तो उसके बाद लौटकर ससुराल नहीं आई।

पति ने पत्नी को वापस लाने के लिए कई बार मायके के फेरे लगाए, कानूनी नोटिस भेजे और अधिकारियों के सामने भी गुहार लगाई। लेकिन जब बात नहीं बनी, तब पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पत्नी को साथ रहने का निर्देश देने की मांग की। फैमिली कोर्ट से राहत न मिलने पर पति ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

पत्नी के गंभीर आरोप: दहेज की मांग और मारपीट

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी प्रियंका ने पति के दावों का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने ससुराल पक्ष पर कई गंभीर आरोप लगाए। पत्नी का कहना था कि शादी में स्विफ्ट कार मिलने के बावजूद ससुराल वाले नाखुश थे और शादी के कुछ ही दिनों बाद क्रेटा कार और 5 लाख रुपए नकद की मांग करने लगे।

पत्नी ने आरोप लगाया कि पति और ससुरालवालों की मारपीट व प्रताड़ना के कारण उनका गर्भपात (Miscarriage) तक हो गया था। उसके शैक्षणिक प्रमाण पत्र, बैंक पासबुक और अन्य जरूरी दस्तावेज भी पति के कब्जे में थे, जिसे लेकर घरेलू हिंसा और अन्य मंचों पर शिकायतें दर्ज कराई गई थीं।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (जस्टिस पीपी साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत) ने दोनों पक्षों की दलीलों की सुनवाई की। अदालत ने माना कि मामला सिर्फ इतने तक सीमित नहीं है कि पत्नी पति के साथ नहीं रह रही है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि उसके अलग रहने के पीछे कारण क्या हैं।

कोर्ट ने कहा कि पति का बार-बार मायके जाना या लीगल नोटिस भेजना इस बात का पक्का सबूत नहीं है कि पत्नी बिना किसी उचित वजह के लौट नहीं रही है। पत्नी द्वारा लगाए गए दहेज प्रताड़ना, मारपीट और गर्भपात जैसे गंभीर आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया और पति की अपील खारिज कर दी।

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